Thursday, 13 July 2017

रात की क़ब्रगाह

यह स्याह सी काली रात 
किसी कब्र से कम नहीं 
साँसों का ही फरक है, दोस्त 
वरना मृत्यु से मुलाक़ात हर रोज़ होती। 

दिन भर चलते रहते पांवों की थकान 
कर्त्तव्यों की अनगिनत फेहरिस्त 
दूर हो जाती है, ग़ुम सी कहीं चली जाती है 
बिस्तर की कब्रगाह में जब आँखें मूंद सी जाती हैं। 

बंद आखों के पीछे कौन जाने क्या देखता है 
कौन सी सुनहरी दुनिया छिपी है,
मुर्दों से कभी बयां ना हो सका  
और इंसानों को भला नींद ही कहाँ आती है!

दुश्चिंताओं का भंवर, आने वाले कल की फ़िकर 
लिपटे हुए से हैं ये साये बदन पे, 
मोती सी सफ़ेद हो या रात सी काली घनी 
बीते वक़्त की अग्नि में सांसें यूँ ही जलती रहीं। 

फिर भी, कहीं तो दीवार है कफ़न की गहराई 
और जीवन की सच्चाई में,
कुछ तो पर्दा है राख़ की रोशनाई,
और नयी सुबह की दस्तक़ में 
जाने क्यों लगता है जाने वाला ही खुशनसीब है 
आँखें जो नहीं खुलतीं फिर से इसी दुनिया 
की दहलीज़ पे। 

- प्रियंका बरनवाल 


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