Tuesday, 10 January 2017

स्वयम का सार

संध्या के इस मध्यम अँधेरे में जब नज़रें ऊपर उठीं
तो गहरे काले बादलों के बीच चमकते घरों को पाया
टिमटिमाती रौशनी के बीच जीवन के तत्त्व को पाया;
थोड़ा और ऊपर देखा तो स्याह आसमां में भी
कुछ अजीब सी दिलकश बात दिखी!
वह गहरी काली चादर कहीं से फटी तो कहीं से खुली थी
और उसमें से झलकता था चन्द्रमा का मंद प्रकाश,
'प्रकाश' जो उम्मीद का आधार है
जिसे बांधा नहीं जा सकता जिसे पाया नहीं जा सकता ,
जो अभेद्य है जो अनंत है, थोड़ा सुगम तो कुछ दुर्गम है
जिसकी चुटकी भर से बुझते दिए में प्राण आ जाए
जिसकी ख़ामोशी ही बिन कहे सब कुछ कह जाए;
ऐसे ही मंद झीने प्रकाश को उस अभिन्न बादलों में
बेसाख्ता चहलकदमी करते हुए पाया;
कहकहों के बीच अपने वजूद का एहसास कराते पाया;
यूँ तो दिन भर गुज़र गया पाई पाई के हिसाब में
मगर स्वयम का सार और बुझती लौ में शक्ति का संचार
संध्या की इन्ही चंद मिनटों में ही मिल पाया।

 - प्रियंका बरनवाल


1 comment:

  1. Yeu to din bhar gujar gaya pai pai ke hisaab me....... good one.

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