Sunday, 6 March 2016

कवि का राज़ .



गिर के खुद उठने में जो मज़ा है
वो किन्ही और हाथों के सहारे में कहाँ ?
नम आँखों की भीनी तरलता को 
अपनी बाहों से मिटाने में जो बात है 
वो किन्हीऔर उँगलियों की तत्परता में कहाँ ?

गिरे कभी नीचे तो धरती को देख लिया 
पैरों के नीचे रहकर भी आसमां छू लेती है;
उठ कर हाथों की धूल झाड़ते जो ऊपर देखा 
पूरा आकाश भी कुछ मंद मंद मुस्कुरा पड़ा;

आत्म-निर्भरता की कड़ी धूप में जो नरमी है
वो किसी स्नेहपगे आलिंगन में कहाँ ?
अकेलेपन के एहसास से लरज़ते लम्हों में भी
दिलों को बांध लेने में जो मज़ा है
वो सन्नाटे को चीरती खुशबू में कहाँ ?

ज़िन्दगी के संघर्ष से स्वयं दो-चार ना हुए तो क्या किया ?
दिल का सुकूं ही काफी है मुस्कुरा लेने के लिए ;
कवि होकर जो खोलूं मैं एक कवि का राज़ - 
जो स्वाद ह्रदय की अंतहीन गहराईयों को
मर्मभेदी शब्दों से सींच लेने में है 
वो किसी और दिमाग की मधुर उपज में है कहाँ ?


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