Wednesday, 28 October 2015

शून्य और ओस.

दूर बहुत दूर कहीं चले जाना है 
जहाँ न हो आसमां का साथ 
और न हो सके धरती से बात 
बस मैं रहूँ और रहे एक अनंत शून्य 
जहाँ शब्द ही न रहें गुनगुनाने को 
हो तो बस एक चपल मौन आज़माने को। 

सोचूँ यही तो मुस्कराहट सी आ जाती है 
आसमां तैर रहा ऊपर और धरती फिसल रही नीचे 
फिर भी उनके अस्तित्व को नकारते हुए बंद आँखों से 
ख्वाब देखती हूँ कुछ अजीब अनसुने 
अजीब ही सही पर हैं तो मेरे अपने 
बस जी सकूँ उसी शून्य में खुद को समेटे। 

कहते हैं - जीना यहाँ और मरना भी यहीं; 
चाहत है तो बस ढूंढ पाऊँ उस ओस को 
जिसकी निर्मल चमक से आँखें खुल जाएं 
जिसके तरल स्वाद से मन शांत हो जाए 
जिस शून्य की तलाश आज भी यूँ जारी है 
काश मिल जाए इन्ही चाँद लाइनो के बहाने से। 



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Hey! Before you leave, i wish you a good day or...night.