Friday, 3 July 2015

Random musings!

Here are some poetry pieces created by me for one of my father's presidential ceremonies. I liked them so thought to add to my blog.

1. वक़्त यूँ कभी ठहरता नहीं , साथ यूँ कभी फिसलते नहीं। 
इस रूप में ना सही तो किसी और रूप में सही , 
हम वो समंदर हैं जो कभी यादों में गुम होते नहीं। 



2. जाने का वक़्त लीजिये कुछ जल्द ही आ गया ,
आपका साथ कुछ ऐसा जो भा गया। 
उम्मीद है बातों का सफर हसीन रहा होगा,
कुछ और नहीं तो नौशीन रहा होगा;
सिलसिला दोस्ती का जो अब है चला,
ताउम्र बना रहे, यही है दुआ;
लेता हूँ आज आप सबसे विदा ,
मुलाक़ात होगी ज़रूर,  
अभी कहो ना अलविदा।  

3. चलते चलते कहीं दूर निकल जाएं,
ना वक़्त का पता हो न दूरी का होश;
जहाँ आसमां हो साथी और क्षितिज हो मंज़िल,
और जहाँ बरसती हो प्रेम की मीठी ओस। 

4. साल भर की मोहलत को चुटकियों में बिता दिए , 
कहा एक काम और नब्बे करके दिखा दिए ;
कहा जब 'अब बस भी करो' तो जवाब आया - 
'कैसे कर दूँ ? ज़िन्दगी के मायने जो अब समझ आ गए'।



5. कह दो आसमां में उड़ते उन बेख़ौफ़ पंछियों से ,
हम में भी हुनर है ज़मीं पे पर फैलाने का। 
क्या हुआ जो ऊंचाइयों को छू ना सके,
फक्र है फिर भी मुस्कुराते चेहरे बनाने का। 




6. खुशियां गर बांटने से बात बन जाती 
तो शायद हम विनर कहलाते। 
आज एक दोस्त ने मात दे दी,
जिसने ख़ुशी के साथ अपनी मेहनत भी बाँट दी। 



7. कल ही की तो बात है 
जब हंसी हंसी में दोस्त बन गए। 
और आज साथ खड़े हमदर्द की तरह,
दोस्ती का अटूट स्तम्भ बन गए। 




8. दिल को जो खुशगवार नेकी से छू जाए 
ऐसा अक्सर नहीं होता। 
मन से समाज की सेवा जो कर जाए 
ऐसा दोस्त नहीं मिलता। 
तारीफ में अब ज़्यादा क्या कहूँ ,
दिल से भावनाओं का मिलन जिसमे हो जाए,
ऐसा समागम नहीं मिलता। 



9. कहते है मोहब्बत से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती 
अरे ज़रा पूछो कोई उनसे 
जिनके ऊपर छत नहीं होती 
और ना सोने को गज़ भर ज़मीं। 
ऐसे में साथ जो निभा जाए 
छत से खुला आकाश और ज़मीं की नरमी जो दिखा जाए,
वही नेक दिल इंसान अब यहाँ मंच पर आ जाए। 






10. साधारण सी जान पहचान एक गहरी दोस्ती में बदल गयी 
मिलते थे जो कभी एक बार, आज रोज़ाना में तब्दील हो गयी ;
देख के जिसे दुनिया ये रश्क़ करे, और कहे तारीफ-ए-क़ाबिल 
ऐ दोस्त तेरी दोस्ती पे नाज़ है हमें, 
जिसके समक्ष आज कुछ भी नहीं ये महफ़िल। 

वक़्त ने दिखाए कई मुक़ाम ,
और बतायी कई कहानियाँ ,
उन सबका हिस्सा तू भी कहीं न कहीं था 
उन सबमें दुआएं तेरी भी कहीं ना कहीं थीं;

शब्द शायद आज काम पड़ जाएं ,
होंठ शायद आज भले थक जाएं ,
दिल की जो बेपनाह ख़ुशी है 
उसे बयां कैसे करें हम?
दोस्ती का ताउम्र फ़र्ज़ भला कैसे अदा करें हम ? 

सफर में यूँ तो कई हमराही आये ,
कुछ साथ चले तो कुछ बिसर गए;
एक तुम ही थे जिसने साथ ना छोड़ा, 
और ना छोड़ा आत्मविश्वास।
फक्र है मुझे आज हमारी ऐसी खूबसूरत दोस्ती पर,
शुक्रिया है दिल से तुम्हे ऐसे ख़ास मौके पर।




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