Monday, 1 September 2014

जानी अंजानी ख्वाहिशें


वक़्त कभी एक सा नहीं रहता,
एक नदी की तरह चपल, 
तो कभी किनारों सा स्थिर नही होता। 
यूँ तो हमने कुछ ऐसी ख्वाहिशें ना रखीं, 
यूँ तो हमने कुछ बड़े सपने ना देखे, 
फिर भी वक़्त के सूक्ष्म थपेड़ों को, 
कितनी ही बारीकियों से, 
ज़िन्दगी के स्वच्छ निर्मल आईने में, 
ना चाहते हुए भी देखा। 
गहनता के शब्दकोष में,
गंभीरता के समावेश में, 
गर देखो तो ये थपेड़े नर्म किरणों सी हैं। 
अपनी निरंतर सी बहती खुशगवार गर्माहट से, 
बहुत कुछ सिखा जाने की समझ है इनमे। 
अब बस देर है तो उन जंग लगे ,
कोनों में छुपे दरवाज़ों को खोलने की,
अब बस देर है तो खुद को उन किरणों से सरोबार करने की। 


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