Sunday, 8 June 2014

'तुम्हारे' लिए ही तो! - एक कविता

देखा है इन आँखों ने टूटे तारों की ख्वाहिशों को ,
देखा है इन आँखों ने बिखरे फूलों की मोहब्बत को।    
और देखा है उन आँखों की झुकी शाम को, 
हंसी से उक्त चेहरे की उस सरल कोमलता को। 

आज यूँ ही बैठे अनमने से बारिश की बूंदों के साथ,
अपनी ही मस्तानी धुन में कुछ गुनगुनाते हुए। 
कि जाने कहाँ से पानी की एक बूँद मचल जाती है, 
और 'टप्प' से हमारी आँखों में समां जाती है। 
होठों पर एक मुस्कराहट सी खिंच आई है ,
जब स्मृतियाँ कुछ यूँ हाथ पकड़ कर बीते वक़्त में 
लौटा ले आई हैं .… 



ऐसा ही तो एक पल था वो भी ! 
जब हम यूँ बैठे थे उस मौसम की अलबेली शाम में ,
महकते गुनगुनाते बारिश की बूंदों के साथ, 
और तुम्हारे हाथ की बनी मसालेदार चाय की चुस्कियों के साथ। 
कि ऐसी ही एक बूँद 'टप्प' से आकर तुम्हारी प्याली में घुलमिल जाती है ,
तुम ये देख यूँ ही हंस पड़ती हो.… 
घने पेड़ों की छाँव सी झुकी उन पलकों में ,
मदहोश बना मैं खो जाना चाहता हूँ 
उमंग से लरज़ते होठों के भीगे मोड़ों पर 
कहीं गुम हो जाना चाहता हूँ। 

मौसम-ए-बहार की उस सुबह का बेवक़्त याद आना ,
फूलों से भरे बाग़ में हमारा कुछ मधुर पलों का बिताना।  
तुम्हारा यूँ गुलमोहर पे झुकना ,
धीरे से गुलाब की पंखुड़ियों को सहलाना ,
गालों पर हल्के से पत्तियों का घुमाना।
और मेरे किसी भी एक कली के तोड़े जाने पर 
अपनी आँखें छोटी कर होठों को भींच कर स्नेह से डांटना 
और मुझसे ये कहना -
'मोहब्बत करनी सीखी नहीं क्या ?'
और मैं हंस पड़ता हूँ ;
गर्दन को 'ना' में हिलाते हुए
कैसे कहूँ? सीखा तो है 
तुमसे ही.… तुम्हे ही और बस तुम्हारे लिए ही 
ज़िन्दगी से मोहब्बत कर बैठा हूँ। 

आज भी मौसम में कुछ जानी पहचानी तरलता है ,
आज भी यूँ ही बैठा हूँ सरल नापाक बूंदों की छाँव में। 
दो ही पल तो कुछ हुए हैं तुम्हे गए हुए 
और यूँ लगा जैसे दो सदियाँ सी बीत गयी हों। 
आँखें इंतज़ार में बूंदों के साथ इधर उधर जाती ,
उन्हें चिढ़ाती और उनके साथ मचलती।
तभी तुम्हारे पायल की खनक ने मुझे तुम तक बाँधा ,
नज़रें उठा के देखा तो तुम्हे आज वैसे ही सामने पाया ;
उसी जानी पहचानी गुनगुने मसालेदार चाय की प्याली के साथ। 
बातें करते करते मुस्कुराते हुए फिर से एक ढीढ बूँद 
'टप्प' से आकर तुम्हारी प्याली में शर्मा सी मिल जाती है 
और तुम फिर से मुस्कुरा उठती हो। 
मौसम ने तुमसे मोहब्बत की 
और मैंने तुमसे…
क्या तुमने भी कभी.…?



तुम कुछ यूँ मदहोश से जब भी देखते हो, 
लगता है कहीं गुम जाना चाहते हो।  
मेरी इस मुस्कराहट को देख, 
मेरी पलकों की छाँव को देख, 
यूँ लगता है बहुत कुछ कह जाना चाहते हो।  
फिर क्यों कुछ कहते नहीं ?
आगे बढ़ मेरा हाथ धीरे से पकड़ते क्यों नहीं ?
बारिश की हर वो शाम को याद रखा है
बाग़ में बिताया हर एक पल सहेज कर रखा है
'तुम्हारे' लिए ही तो !
आँखें उठती हैं, पलकें झुकती हैं 
'तुम्हारे' लिए ही तो !
मैं मुस्कुराती हूँ, शर्मा जाती हूँ 
'तुम्हारे' लिए ही तो !
तो आज कुछ तो कहो कुछ तो सुनो। 
मौसम ने तो मोहब्बत कर ली मुझसे 
कभी तुम भी कुछ ऐसी शरारत सीख लो। 

आज पानी की इस बूँद ने कुछ बदमाशी सी की है 
मुझे धीरे से सहमा कर गुस्ताखी की है। 
बुद्धू ! मुझे आज़माती है ?
अपने छोटे से अस्तित्व से मुझे सहमाती है ?
क्या जानती नहीं कि 
मुहब्बत में कभी देर नहीं होती
दिल की बात कह देने वालों की हार नहीं होती 
जान तो वैसी ही कुर्बान होनी है 
कह दो तब भी… 
और ना कहो तब भी …
कनखियों से मैं उसे देखता हूँ ;
बड़ी सी खूबसूरत आँखें प्याले पर टिकी हैं 
उंगलियां कुछ घबराई सहमी सी लगती हैं 
कांपते से हाथों से उस स्वप्न से सुन्दर चेहरे को 
अपने हाथों से उठाता हूँ। 
आह ! आँखें हैं या किताब !
झपकती पलकें हैं या दिल का आइना !
पढ़ लिया आज जो कभी कहीं और ना सीखा 
देख लिया खुद को जैसा कभी और ना देखा 
वो हंसी, धीरे से मुस्कुराई ,
और मैं फिर खो गया उन घनी छाँव में 
मदहोश से भीगे से उन मोड़ों पे। 



चलो! आज तुमने कुछ तो शरारत की।  
पानी की एक नन्ही बूँद ने ही सही 
तुमसे दिल की बात कह डालने की 
दिलकश हिमाकत तो करवाई। 
अब बस वक़्त यूँ ही कुछ थम सा जाए,
हम यूँ ही खोये रहे और बैठे रहें पास पास। 
 और अगर  कुछ चलती रहे तो ये सुहानी बूँदें, 
और उससे भी सुहाना हमारा साथ !



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