Thursday, 13 March 2014

कुछ - A poem



कुछ लम्हे तुम जियो कुछ लम्हे हम 
कुछ कदम तुम चलो कुछ कदम हम 
ज़िन्दगी यूँ ही 'कुछ' के पन्नों की बनी है 
न समझो तो ग़म और समझ लो तो सरगम !
याद है सफ़र में चलते हुए, कम्बल के अहाते से ढके 
एक सन्देश भेजा था तुमने जो आज भी साथ है 
कितने भीगे से शब्द थे वो कुछ 
कितने नरम कोमल से पल थे वो कुछ 
उन्ही 'कुछ' के ताने बाने से बनी ये ज़िन्दगी 
आज भी चलती चली और बहती चली ।
लब थे कि सिहरते हुए शब्द 
स्पर्श था या नाज़ुक सा सम्बल 
'कुछ' तो था जी आज भी है 
और वही 'कुछ' ठहरा हुआ सा है कहीं बरबस।
मन कुछ यूँ ही सम्हल सा रहा था 
होठ कुछ यूँ ही गुनगुना से रहे थे 
कानों में तुमने शहद सा जो घोल दिया था 
और वही टप टप सी मिठास आज भी
कहीं हमें खींच ले जाती है।
समय बदला, लोग बदले और बदला ज़माना
मगर कुछ नहीं बदला तो 'हम'
'हम' तब भी यूँ ही पूरे थे और आज भी
खालीपन का निशाँ नहीं और 'कुछ ख़ास' से विदा नहीं।  



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